श्विक कूटनीति और युद्ध के मैदान में इस समय जो समीकरण बन रहे हैं, उसने सुपरपावर अमेरिका के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर बार-बार हमले की धमकियां तो दे रहे हैं, लेकिन अमेरिकी सेना कोई बड़ा कदम उठाने से हिचक रही है। सवाल उठना लाजिमी है कि दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत आखिर बैकफुट पर क्यों है? इसका सीधा जवाब है—रूस, चीन और ईरान का त्रिकोण (Axis of Three)। इन तीन चेहरों ने मिलकर पर्दे के पीछे एक ऐसा कूटनीतिक और सैन्य जाल बिछा दिया है, जिसमें ट्रंप की हर रणनीति उलझकर रह गई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है, "ईरान के पास एटमी हथियार नहीं हो सकते, हम उन्हें एक और बड़ा झटका दे सकते हैं।" वहीं उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी दावा कर रहे हैं कि अमेरिका ऐसी किसी डील को मंजूर नहीं करेगा जिससे ईरान न्यूक्लियर पावर बने। लेकिन जमीनी हकीकत इन बयानों से कोसों दूर है। ईरान के साथ हुई 40 दिनों की भीषण जंग के बाद अमेरिका का वह वैश्विक खौफ और दबदबा करीब-करीब खत्म हो चुका है, जिसके दम पर वह दुनिया को नियंत्रित करता था।
1. अमेरिकी वर्चस्व पर 'दोहरा प्रहार' (यूक्रेन से ईरान तक विफलता)
ट्रंप प्रशासन इस समय एक साथ दो मोर्चों पर फंसा हुआ है, जिसे संभालना उनके लिए 'बारूदी भंवर' साबित हो रहा है:
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ईरान का अड़ियल रुख: 40 दिनों तक चली विध्वंसक जंग और भारी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान घुटने टेकने को तैयार नहीं है। वह ट्रंप की शर्तों को सिरे से खारिज करते हुए लगातार कड़े तेवर दिखा रहा है।
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यूक्रेन युद्ध पर बेअसर धमकियां: ट्रंप ने सत्ता में आते ही यूक्रेन युद्ध को 24 घंटे में रोकने का दावा किया था। इसके लिए उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की और यूरोपीय देशों (NATO) को फंड रोकने की धमकियां भी दीं। लेकिन इसका असर न तो पुतिन पर हो रहा है और न ही जेलेंस्की पर। रूस सैन्य ताकत के बल पर यूक्रेन में अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए लगातार हमले तेज कर रहा है।
बदलता वैश्विक समीकरण: दशकों में यह पहली बार देखा जा रहा है जब दुनिया के कई छोटे-बड़े देश न तो अमेरिका की शर्तें मान रहे हैं और न ही उसकी धमकियों से डर रहे हैं। वेनेजुएला से लेकर मध्य-पूर्व तक ट्रंप की 'ग्लोबल पॉलिसी' उल्टी पड़ती दिखाई दे रही है।
2. 'रूस-चीन-उत्तर कोरिया-ईरान' का बढ़ता गठजोड़
अमेरिका के अलग-थलग पड़ने की सबसे बड़ी वजह एंटी-वेस्टर्न (पश्चिम विरोधी) देशों का एक मजबूत ब्लॉक बनना है। इस समय दुनिया दो धड़ों में बंटती दिख रही है:
| शक्तिशाली ब्लॉक (The New Axis) |
अमेरिकी खेमा (US & Allies) |
| रूस, चीन, ईरान और उत्तर कोरिया |
अमेरिका और कमजोर पड़ते यूरोपीय सहयोगी |
| इनके पास मजबूत सप्लाई चेन, आधुनिक मिसाइलें और असीमित कच्चा तेल है। |
ट्रंप की नीतियों के कारण नाटो (NATO) और यूरोप के साथ रिश्तों में दरार आ चुकी है। |
40 दिनों तक ईरान ने जिस तरह अमेरिकी हथियारों को नुकसान पहुंचाया (जिसमें F-35 फाइटर जेट और रीपर ड्रोन्स शामिल थे), उसने यह साफ कर दिया कि ईरान अकेला नहीं है। उसे बैकएंड से चीन की आर्थिक और रूस की सैन्य व खुफिया तकनीक का पूरा सपोर्ट मिल रहा है।
3. ट्रंप की 'अकेले चलो' की नीति ही बनी कमजोरी
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की साख गिरने की सबसे बड़ी वजह खुद डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां हैं। ट्रंप ने अपनी "अमेरिका फर्स्ट" (America First) नीति के तहत नाटो (NATO) और पारंपरिक यूरोपीय देशों से रिश्ते खराब कर लिए हैं। नतीजा यह है कि आज जब अमेरिका मध्य-पूर्व (Middle East) के भंवर में फंसा है, तो कोई भी बड़ी वैश्विक ताकत उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी होने को तैयार नहीं है। रूस और चीन के इस चक्रव्यूह ने ट्रंप को रणनीतिक रूप से पंगु बना दिया है, जहां से आगे बढ़ना सीधे तीसरे विश्व युद्ध को न्योता देना होगा।