नई दिल्ली: भारत और 27 देशों के यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अब धरातल पर उतारने की प्रशासनिक और रणनीतिक कवायद तेज हो गई है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जहां इस मेगा डील को अंतिम रूप देना 'आर्थिक कूटनीति का एक दुर्लभ और ऐतिहासिक क्षण' था, वहीं अब इसके प्रावधानों को देश के छोटे-बड़े निर्यातकों, निवेशकों और रोजगार सृजकों के लिए वास्तविक मुनाफे में बदलना एक नए 'पहाड़ चढ़ने' के समान चुनौतीपूर्ण है। फिक्की (FICCI) और सेंटर फॉर ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट लॉ द्वारा आयोजित एक संयुक्त राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के मुख्य वार्ताकार और वाणिज्य मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव दर्पण जैन ने यह कड़ा संदेश दिया।
श्रम-प्रधान उद्योगों के लिए ₹33 अरब डॉलर का खुला बाजार
जनवरी में घोषित हुए इस दूरगामी समझौते के तहत यूरोपीय संघ के बाजारों में भारत के लगभग 99.5 प्रतिशत निर्यात के लिए शून्य या बेहद कम सीमा शुल्क (Zero Tariff) का मार्ग प्रशस्त हुआ है:
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शुल्क समाप्ति से बड़ी राहत: भारत से निर्यात होने वाले वस्त्र, रेडीमेड कपड़े, चमड़ा, जूते, रत्न और आभूषण जैसे श्रम-प्रधान सामानों पर वर्तमान में यूरोप में 10 से 14 प्रतिशत (कुछ विशेष श्रेणियों में 26 प्रतिशत तक) का भारी आयात शुल्क लगता है, जो अब पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
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वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी: भारत वर्तमान में यूरोपीय संघ को लगभग 33 अरब डॉलर मूल्य के श्रम-प्रधान सामानों का निर्यात करता है। भारत और यूरोपीय संघ का संयुक्त आयात-निर्यात मिलकर वैश्विक वस्तु एवं सेवा व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा कवर करता है, जो इस समझौते को दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक ब्लॉक बनाता है।
गैर-शुल्क बाधाओं और तकनीकी मानकों से निपटने की तैयारी
सम्मेलन के दौरान विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक संरक्षणवाद के इस दौर में नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार को बचाए रखने के लिए यह समझौता एक मिसाल है। फिक्की के महासचिव अनंत स्वरूप ने बताया कि भारत के कुल वस्तु व्यापार में अकेले यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 12 प्रतिशत है। अब असली चुनौती देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) और सेवा प्रदाताओं तक इसके ठोस लाभ पहुंचाना है। शाही एक्सपोर्ट्स के प्रबंध निदेशक हरीश आहूजा ने कहा कि भारतीय उद्योग को यूरोपीय बाजारों में सफल बनाने के लिए हमें अपने मानक बुनियादी ढांचे (Standard Infrastructure), वैश्विक प्रमाणन क्षमताओं, डिजिटल अनुपालन टूल्स और कड़े गैर-शुल्क अवरोधों (Non-Tariff Barriers) को तेजी से दूर करने के लिए एक बेहद मजबूत और आधुनिक संस्थागत तंत्र विकसित करना होगा।