बिहार में भू-माफियाओं और जमीन के अवैध कारोबार के खिलाफ चल रहे सरकारी अभियान ने अब एक नया और तीखा मोड़ ले लिया है। 2 जनवरी 2026 को बिहार की सियासत में उस वक्त उबाल आ गया जब उपमुख्यमंत्री और राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा के अभियान के बीच जेडीयू ने आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की संपत्तियों की जांच की मांग कर दी।
यह मामला तब शुरू हुआ जब जेडीयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने सार्वजनिक रूप से मांग की कि जब प्रदेश में जमीन माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, तो लालू यादव के परिवार की जमीनों और संपत्तियों की भी गहन जांच होनी चाहिए।
जेडीयू की मांग और सियासी सरगर्मी
जेडीयू नेता नीरज कुमार का तर्क है कि कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। उन्होंने डिप्टी सीएम विजय सिन्हा से अपील की कि पटना और अन्य जिलों में लालू परिवार के नाम दर्ज जमीनों के दस्तावेजों को खंगाला जाए। नीरज कुमार ने खासकर राबड़ी देवी आवास से जुड़े हालिया विवादों और संपत्तियों में 'तहखाने' होने जैसे आरोपों का जिक्र करते हुए कहा कि पारदर्शिता के लिए यह जांच जरूरी है।
जेडीयू की इस मांग ने बिहार के सियासी तापमान को इसलिए बढ़ा दिया है क्योंकि विजय सिन्हा इन दिनों अपने विभाग में 'जीरो टॉलरेंस' की नीति पर काम कर रहे हैं। वे लगातार जिलों का दौरा कर रहे हैं और 'जनसंवाद' के जरिए आम जनता की जमीन संबंधी शिकायतें सुन रहे हैं।
विजय सिन्हा का रुख: 'आवेदन आएगा तो होगी जांच'
इस पूरे विवाद पर उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने बेहद संतुलित लेकिन स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा: "हमारा अभियान किसी व्यक्ति या दल विशेष को निशाना बनाने के लिए नहीं है। हम सिस्टम की सफाई कर रहे हैं। लेकिन, अगर जेडीयू नेता या कोई भी नागरिक हमारे 'भूमि सुधार जनकल्याण संवाद' कार्यक्रम में औपचारिक रूप से आवेदन देता है, तो सरकार और विभाग उस पर गंभीरता से विचार करेंगे और नियमसंगत जांच कराई जाएगी।"
विजय सिन्हा का यह बयान संकेत देता है कि सरकार इस मुद्दे को पूरी तरह खारिज नहीं कर रही है। उन्होंने साफ कर दिया कि उनका विभाग हर उस शिकायत पर कार्रवाई करेगा जिसके पीछे ठोस तथ्य होंगे।
अधिकारियों को सख्त चेतावनी
विजय सिन्हा ने केवल भू-माफियाओं पर ही नहीं, बल्कि विभाग के भीतर बैठे उन भ्रष्ट अधिकारियों को भी चेतावनी दी है जो माफियाओं के साथ सांठगांठ रखते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अवैध कब्जों और फर्जी दस्तावेजों के खेल में शामिल किसी भी अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा। उनका मानना है कि जब तक विभागीय मिलीभगत खत्म नहीं होगी, तब तक बिहार की भूमि व्यवस्था को पारदर्शी नहीं बनाया जा सकता।
सियासी कोण: बदला या कानून?
लालू यादव की जमीनों की जांच की मांग ने बिहार की राजनीति को दो ध्रुवों में बांट दिया है।
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सत्तारूढ़ गठबंधन का पक्ष: जेडीयू और बीजेपी इसे 'न्याय के साथ विकास' का हिस्सा बता रहे हैं, जहाँ बड़े से बड़ा रसूखदार व्यक्ति भी जांच के दायरे से बाहर नहीं है।
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आरजेडी का संभावित पक्ष: हालांकि आरजेडी की ओर से अभी कोई विस्तृत आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन पार्टी इसे पुरानी शैली में 'राजनीतिक प्रतिशोध' (Political Vendetta) करार दे सकती है।