2025 में जब डोनाल्ड ट्रंप ने 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति के तहत भारत सहित कई देशों पर भारी टैरिफ लगाए, तो वैश्विक बाजार में हड़कंप मच गया। अमेरिका का उद्देश्य भारत के कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जबरन सेंध लगाना था। लेकिन भारत ने न केवल इस दबाव को झेला, बल्कि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को भी बरकरार रखा।
1. दबाव बनाम कूटनीति: ट्रंप की चुनौती
ट्रंप प्रशासन ने 2025 में ट्रेड डील को लेकर 'जल्दबाजी' दिखाई। उन्होंने भारतीय निर्यात पर उच्च शुल्क लगाए और रूस के साथ ऊर्जा व्यापार को लेकर प्रतिबंधों की धमकी दी। अमेरिका चाहता था कि भारत अपने डेयरी और कृषि बाजार को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोल दे।
2. सफल समझौते: जहाँ सम्मान मिला, वहाँ बात बनी
अमेरिका के साथ चल रही खींचतान के बीच भारत ने अन्य देशों के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाई। 2025 में भारत ने तीन प्रमुख देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप दिया:
-
ब्रिटेन (UK): यह समझौता भारतीय पेशेवरों (IT और हेल्थकेयर) और सर्विस सेक्टर के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।
-
न्यूजीलैंड: यहाँ भारत ने चतुराई से बातचीत की, जिससे कीवी उत्पादों को बाजार तो मिला लेकिन भारतीय डेयरी किसानों की सुरक्षा सुनिश्चित रही।
-
ओमान: खाड़ी देशों में पैठ मजबूत करने और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से ओमान के साथ हुई डील रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
3. 'मल्टी-अलाइनमेंट': विकल्पों का विस्तार
भारत की 2025 की नीति का सबसे बड़ा हिस्सा बाजार विविधीकरण (Market Diversification) रहा। भारत ने महसूस किया कि किसी एक देश (जैसे अमेरिका या चीन) पर अत्यधिक निर्भरता खतरनाक हो सकती है।
-
यूरोपीय संघ (EU), पेरू, चिली और कनाडा के साथ चल रही सक्रिय बातचीत इसी रणनीति का हिस्सा है।
-
इससे भारत की 'रणनीतिक आजादी' बढ़ी है। अब भारत मेज पर उस स्थिति में बैठता है जहाँ वह कह सकता है कि उसके पास अन्य विकल्प भी मौजूद हैं।
4. आर्ट ऑफ द डील: भारत का नया अंदाज
भारत अब केवल एक बड़ा 'बाजार' नहीं है, बल्कि एक 'ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब' बनने की दिशा में अग्रसर है। 2025 की ट्रेड पॉलिसी ने यह संदेश दिया कि भारत सख्ती और लचीलेपन का सही संतुलन जानता है।
-
सख्ती: राष्ट्रीय सुरक्षा और किसानों के हितों पर।
-
लचीलापन: तकनीक हस्तांतरण, निवेश और सर्विस सेक्टर के आदान-प्रदान पर।